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स्वामी सहजानंद के विषय के संदर्भ में बिहार में हुए कृषक आंदोलन पर आलोचना


बिहार में हुए कृषक आंदोलन ब्रिटिश शासन एवं उसके संरक्षण में पल रहे जमींदारों और देसी रजवाड़ों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध केंद्रित था जमीदारी व्यवस्था में जमींदारों को भूस्वामी बना दिया गया था साथ ही लगान की दर अधिक होती थी लगान वसूली के तरीके भी कठोर होते थे कृषि सुधार में जमींदारों एवं सरकार की रूचि नगर ने हो गई थी आपात काल में राहत एवं सूट की व्यवस्था भी नहीं होती थी महाजनी दिन जाल भ्रष्ट पुलिस प्रशासन खर्चीली व न्याय प्रणाली ने किसानों का जीवन और दुर्बल बना दिया था और आंदोलन ही एकमात्र उपाय शेष रह गया था इनके अतिरिक्त और भी कारण ने समय-समय पर तृषा को को आंदोलन के प्रेरित किया जैसे कृषि वनीकरण आर्थिक मंदी वामपंथी इत्यादि









बिहार में किसान आंदोलन की शुरुआत 1917 के चंपारण कृषक आंदोलन से हुआ महात्मा गांधी के प्रथम सत्याग्रह द्वारा किसानों को नील की अवैध वसूली तीन कठिया पति को मुक्त मिली चंपारण की सफलता ने बिहार के अन्य क्षेत्रों के किसानों को शोषण के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा मिली 1919 के मध्य में स्वामी विद्यानंद के नेतृत्व में दरभंगा राज के विरुद्ध आंदोलन संगठित हुए राज द्वारा कुछ मांगों को मान लिए गए जिसके कारण यह आंदोलन शिथिल पड़ गया





मुंगेर में 1922-23 में किसान सभा का गठन मोहम्मद जुबेर श्री कृष्ण सिंह द्वारा किया गया किसान आंदोलन को निर्णायक मोरया स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जिन्होंने 4 मार्च को किसान सभा की स्थापना की इस सभा की गतिविधियां काफी बड़े पैमाने पर हुई इसी वर्ष सरदार वल्लभभाई पटेल बिहार की यात्रा कर किसानों में चेतना जगाने का कार्य किया इस आंदोलन की बढ़ती हुई लोकप्रियता एक और जमीन दाढ़ी का वर्ग चिंतित और सतर्क हुआ तो दूसरी ओर इस का दमन के लिए सरकार पर दबाव डालने की आरंभ हुई





इस उद्देश्य से एक राजनीतिक दल यूनाइटेड पॉलीटिकल पार्टी के नाम से संगठित हुआ किसान सभा द्वारा 1933 ईस्वी में एक जांच समिति का गठन किया गया जिसमें किसानों की दयनीय दशा को प्रति ध्यान आकर्षित करने का काम किया किसान सभा की लोकप्रियता में निर्णायक प्रीति इसी काल में हुई 1936 ईस्वी में इसकी सदस्यता 25 लाख तक पहुंच गई थी कुछ समय के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और किसान सभा के बीच तालमेल भी बना रहा 1937 के चुनाव के पूर्व दोनों में समझौता हुआ और कांग्रेस ने अपने एक चुनावी घोषणा पत्र में किसानों की समस्या पर भी चर्चा की मगर चुनाव के बाद जब बिहार में कांग्रेसी मंत्री मंडल की स्थापना हुई तो किसान सभा के साथ मतभेद प्रारंभ हो गए कारण किसान की समस्या का समाधान करने में इस मंत्रिमंडल ने कोई और भी रुचि नहीं ली एक तो इस प्रांतीय सरकार की शक्ति नाम मात्र की थी तो दूसरी बात कांग्रेसी नेतृत्व एक वर्ग उन समस्याओं के समाधान के लिए उत्सुक नहीं था इस तनाव के कारण चंपारण सारण और मुंगेर की जिलों कांग्रेस समिति ने अपनी सदस्यता को किसान सभा के झूलों में भाग लेने से रोक दिया





मई 1930 स्कीम में चौकीदारी विरोधी अभियान पूरे बिहार में बड़ा सफल रहा 1931 में जहानाबाद में किसानों को एक सम्मेलन में जमींदारों द्वारा किसानों को दमन की निंदा की गई बिहार में कांग्रेस ने राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में एक कृषक जांच समिति की स्थापना की इसके अन्य सदस्य श्री कृष्ण सिंह अब्दुल बारी बिपिन बिहारी वर्मा बलदेव सहाय राजेंद्र मिश्र राधा गोविंद प्रसाद और कृष्णा सहाय थे 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के क्रम में किसान अधिक हिंसात्मक हो गए थे





यद्यपि किसान आंदोलन आजादी कब तक अपने उद्देश्य का प्राप्त करने में सफल नहीं हो सका न तो जमीदारी उन्मूलन हो सका और नहीं ग्रामीणों इन करता का स्थाई समाधान ही हो सका लेकिन इसने कृषक को में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और वर्ग की चेतना का संचार किया साथ ही आजादी के बाद होने वाली जमीदारी उन्मूलन समिति कृषि सुधार तथा भूमि सुधार की पृष्ठभूमि तैयार करने में अहम भूमिका निभाई





स्वामी सहजानंद की आलोचना यह कह कर की जाती है कि वे ब्रिटिश सरकार के साथ जमींदार और जमीदारी प्रथा का विरोध कर रहे थे लेकिन राष्ट्रीय आंदोलन के समय जमींदारों को अपना दुश्मन बनाना समय की मांग नहीं थी यही कारण था कि कृषक हित में जमींदारों के विरुद्ध किसी बड़े कदम का उठाने से कांग्रेस परहेज करती रही फलता कांग्रेस और किसान सभा में मतभेद होते रहे कांग्रेस जमींदार समर्थक नहीं थी अगर होती तो आजादी के बाद जमीदारी उन्मूलन नहीं किया जाता





यह सही है कि सहजानंद ब्रिटिश राज के साथ-साथ जमींदारों के विरोधी आंदोलन चला रहे थे जो राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति से मेल नहीं खाती थी लेकिन उनका मूलभूत उद्देश्य था शोषित पीड़ित किसानों को मुक्ति अंता उनके आंदोलन को भुलाया नहीं जा सकता किसान आंदोलन में उनकी भूमिका इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि उन्होंने किसानों के आंदोलन को संगठित एवं अखिल भारतीय प्रारूप प्रदान किया